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रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई हुंकार: जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री से T-72 टैंकों का ऐतिहासिक ‘रोल-आउट’

जबलपुर (संस्कारधानी)। भारतीय सेना की शक्ति और देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में आज एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। जबलपुर स्थित व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह भारतीय थल सेना की रीढ़ क्यों कही जाती है। आज फैक्ट्री परिसर में आयोजित एक भव्य समारोह में, अत्याधुनिक रूप से ओवरहॉल (जीर्णोद्धार) किए गए T-72 ‘अजेय’ टैंकों का सफल रोल-आउट किया गया। यह उपलब्धि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को धरातल पर उतारने और स्वदेशी रक्षा तकनीकों को मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।

क्या है T-72 टैंकों का ‘रोल-आउट’ प्रोजेक्ट?

T-72 टैंक, जिन्हें भारतीय सेना में ‘अजेय’ के नाम से जाना जाता है, दशकों से देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। समय के साथ इन टैंकों को आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप अपग्रेड करना अनिवार्य होता है। जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री को इन टैंकों के पायलट ओवरहॉल (Pilot Overhaul) की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। रोल-आउट का अर्थ है कि इन टैंकों का नवीनीकरण कार्य पूरी तरह सफल रहा है और अब ये युद्ध क्षेत्र में पुनः तैनाती के लिए तैयार हैं।

तकनीक और ताकत का संगम

VFJ द्वारा तैयार किए गए इन टैंकों में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं:

  • इंजन क्षमता: टैंक के पुराने इंजन को बदलकर उसकी शक्ति और कार्यक्षमता को बढ़ाया गया है, जिससे यह कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ सके।
  • फायर कंट्रोल सिस्टम: रात में सटीक निशाना लगाने के लिए इसमें उन्नत ‘थर्मल इमेजर’ और लेजर रेंज फाइंडर लगाए गए हैं।
  • कवच (Armour): टैंक की सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए इसमें नई पीढ़ी के ‘एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर’ (ERA) पैनल जोड़े गए हैं।
  • संचार प्रणाली: आधुनिक डिजिटल संचार उपकरणों से लैस यह टैंक अब युद्ध के मैदान में अन्य इकाइयों के साथ बेहतर तालमेल बैठा सकेगा।

जबलपुर: रक्षा उत्पादन का ‘पावरहाउस’

जबलपुर हमेशा से ही आयुध निर्माणियों (Ordnance Factories) का केंद्र रहा है। व्हीकल फैक्ट्री (VFJ) के साथ-साथ गन कैरिज फैक्ट्री (GCF), ऑर्डनेंस फैक्ट्री खमरिया (OFK) और ग्रे आयरन फाउंड्री (GIF) मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाते हैं, जो भारतीय सेना को गोला-बारूद से लेकर भारी वाहनों तक सब कुछ मुहैया कराता है। T-72 टैंकों का सफल रोल-आउट न केवल VFJ के कुशल इंजीनियरों की जीत है, बल्कि यह जबलपुर की औद्योगिक पहचान को भी वैश्विक मानचित्र पर मजबूत करता है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में कदम

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, पहले इन टैंकों के ओवरहॉल और प्रमुख कलपुर्जों के लिए विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन अब, जबलपुर में विकसित की गई इस स्वदेशी ओवरहॉल तकनीक से करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही, भविष्य में इन टैंकों के रखरखाव के लिए हमें किसी दूसरे देश का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।

रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर

रक्षा क्षेत्र की इस सक्रियता का सीधा लाभ जबलपुर के स्थानीय छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को मिल रहा है। टैंकों के ओवरहॉल के लिए आवश्यक कई छोटे पुर्जे और सहायक सामग्रियां स्थानीय वेंडरों से ली जा रही हैं। इससे शहर में तकनीकी कौशल (Skill Development) बढ़ रहा है और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के हजारों अवसर पैदा हो रहे हैं।

भविष्य की योजनाएं

रोल-आउट समारोह के दौरान अधिकारियों ने संकेत दिए कि T-72 के बाद अब T-90 ‘भीष्म’ टैंकों के कुछ महत्वपूर्ण घटकों के निर्माण और ओवरहॉल की योजना पर भी विचार किया जा रहा है। जबलपुर की निर्माणियां अब ड्रोन, मानवरहित वाहन (UGV) और आधुनिक तोपों (जैसे ‘धनुष’ और ‘शारंग’) के उत्पादन में भी अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार हैं।

निष्कर्ष

जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री से निकले ये लोहे के ‘अजेय’ योद्धा केवल मशीनें नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय सेना के साहस और जबलपुर की इंजीनियरिंग प्रतिभा का प्रतीक हैं। T-72 टैंकों का यह रोल-आउट यह विश्वास दिलाता है कि भारत की सुरक्षा अब पूरी तरह स्वदेशी हाथों में सुरक्षित है। संस्कारधानी के लिए यह गर्व का क्षण है कि उसकी मिट्टी में बना लोहा सरहदों पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाएगा।

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