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‘टाइगर स्टेट’ में बाघों की असुरक्षा पर हाई कोर्ट का प्रहार: केंद्र और राज्य सरकार से माँगा जवाब, पूछा— “सुरक्षा में चूक क्यों?”

मध्य प्रदेश को गौरव के साथ ‘टाइगर स्टेट’ (Tiger State) का दर्जा दिया जाता है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने इस खिताब पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य के विभिन्न टाइगर रिजर्व और जंगलों में बाघों की अप्राकृतिक मौतों (शिकार, करंट और संदिग्ध परिस्थितियों) पर गहरी नाराजगी जताते हुए केंद्र और राज्य सरकार को सख्त फटकार लगाई है। कोर्ट ने इसे जैव विविधता के प्रति एक गंभीर लापरवाही करार दिया है।

हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और याचिका

यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चीफ जस्टिस की खंडपीठ के सामने आया। याचिका में साक्ष्य पेश किए गए कि मध्य प्रदेश के बांधवगढ़, पेंच और कान्हा जैसे राष्ट्रीय उद्यानों के बफर जोन में बाघों की मौत के आंकड़े साल-दर-साल बढ़ रहे हैं।

  1. अप्राकृतिक मौतों का मुद्दा: याचिका में बताया गया कि कई बाघों की मौत करंट लगने या जहर देने के कारण हुई है, जो सीधे तौर पर सुरक्षा प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है।
  2. शिकार की घटनाएं: जंगलों के आसपास बिछाए गए अवैध बिजली के तारों (Electric Fencing) में फंसकर बाघ अपनी जान गंवा रहे हैं, जिस पर वन विभाग का नियंत्रण नाममात्र का रह गया है।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस की पीठ ने सरकारी पक्ष के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कुछ गंभीर सवाल पूछे:

  • “सिर्फ कागजों पर बाघों का संरक्षण”: कोर्ट ने कहा कि टाइगर स्टेट का दर्जा केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीन पर बाघों की सुरक्षा में दिखना चाहिए। यदि शिकार की घटनाएं रुक नहीं रही हैं, तो करोड़ों रुपये के फंड का उपयोग कहाँ हो रहा है?
  • जवाबदेही तय करने का निर्देश: कोर्ट ने फटकार लगाते हुए पूछा कि बाघों की मौत के बाद निचले स्तर के कर्मचारियों पर तो कार्रवाई होती है, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों (Dfo और Range Officers) की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती?
  • NTCA को नोटिस: कोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को भी नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या उन्होंने मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व का ऑडिट किया है।

बाघों की मौत के प्रमुख कारण और चिंताएं

हाई कोर्ट ने उन कारणों पर भी गौर किया जो बाघों के लिए काल बन रहे हैं:

  • इलेक्ट्रिक फेंसिंग: ग्रामीण अक्सर अपनी फसलों को बचाने के लिए खेतों के किनारे करंट फैलाते हैं, जिसमें फंसकर बाघों की मौत हो जाती है।
  • टेरिटोरियल फाइट या साजिश?: कई मौतों को ‘आपसी लड़ाई’ बताकर फाइल बंद कर दी जाती है, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अक्सर संदिग्ध रसायन या चोट के निशान मिलते हैं।
  • कर्मचारियों की कमी: टाइगर रिजर्व के बड़े इलाकों की निगरानी के लिए पर्याप्त वन रक्षक (Forest Guards) नहीं हैं, जिससे शिकारियों के हौसले बुलंद हैं।

सरकार से माँगा गया एक्शन प्लान

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और वन विभाग को 4 सप्ताह के भीतर एक विस्तृत कार्ययोजना (Action Plan) पेश करने का आदेश दिया है:

  1. जंगलों के बफर जोन में बिजली की लाइनों की निगरानी कैसे की जा रही है?
  2. बाघों की मौत के मामलों में अब तक कितने लोगों को सजा मिली है?
  3. शिकार रोकने के लिए आधुनिक तकनीकों (जैसे ड्रोन और सेंसर) का क्या उपयोग हो रहा है?

निष्कर्ष

जबलपुर हाई कोर्ट की यह फटकार वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षणवादियों के लिए एक उम्मीद की किरण है। ‘टाइगर स्टेट’ का तमगा बरकरार रखना केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट के कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि शासन और प्रशासन ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया, तो हाई कोर्ट को वन्यजीव संरक्षण के लिए कठोर वैधानिक आदेश जारी करने पर मजबूर होना पड़ेगा।

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