हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को ‘सरकारी कर्मचारी’ का दर्जा देने पर राज्य सरकार से जवाब तलब
जबलपुर: न्याय की दहलीज पर लाखों कार्यकर्ताओं की उम्मीद मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लेकर जबलपुर तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के अधिकारों को लेकर चल रही कानूनी जंग अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। याचिका में मांग की गई है कि प्रदेश की लाखों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को ‘सरकारी कर्मचारी’ घोषित किया जाए और उन्हें न्यूनतम वेतनमान सहित वे सभी लाभ दिए जाएं जो एक नियमित शासकीय सेवक को मिलते हैं। इस आदेश के बाद प्रदेश भर के महिला बाल विकास विभाग में हड़कंप मच गया है।
याचिका का मुख्य आधार और कार्यकर्ताओं की दलील
यह याचिका आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ द्वारा दायर की गई है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि वे शासन की रीढ़ की हड्डी की तरह काम कर रही हैं, लेकिन उनके साथ होने वाला व्यवहार न्यायसंगत नहीं है।
- काम का बोझ बनाम मानदेय: कार्यकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वे केवल बच्चों के पोषण और टीकाकरण तक सीमित नहीं हैं। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, बीएलओ कार्य और लाड़ली बहना जैसी बड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन का पूरा जिम्मा उन्हीं पर होता है। इसके बावजूद उन्हें मात्र ‘मानदेय’ (Honorarium) दिया जाता है, जो वर्तमान महंगाई के दौर में बेहद कम है।
- न्यूनतम वेतन से भी कम: याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि कार्यकर्ताओं को मिलने वाली राशि सरकार द्वारा निर्धारित ‘न्यूनतम वेतन’ (Minimum Wage) के मानकों से भी कम है, जो संवैधानिक रूप से श्रम अधिकारों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी और निर्देश
जस्टिस की एकल पीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए।
- जवाब पेश करने की डेडलाइन: कोर्ट ने राज्य सरकार और महिला बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब (Affidavit) पेश करें। कोर्ट यह जानना चाहता है कि जब इन कार्यकर्ताओं से पूर्णकालिक सरकारी काम लिया जा रहा है, तो उन्हें सेवा नियमों के दायरे में क्यों नहीं लाया गया।
- समान कार्य-समान वेतन: याचिकाकर्ताओं के वकील ने ‘समान कार्य-समान वेतन’ के सिद्धांत का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यदि एक ही प्रकृति का काम नियमित कर्मचारी कर रहे हैं, तो आउटसोर्स या मानदेय प्राप्त कार्यकर्ताओं को उनके लाभों से वंचित नहीं रखा जा सकता।
क्या-क्या हैं प्रमुख मांगें?
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी याचिका में केवल नियमितीकरण ही नहीं, बल्कि कई अन्य बुनियादी सुविधाओं की भी मांग की है:
- सामाजिक सुरक्षा: सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि (PF) का लाभ मिलना चाहिए।
- स्वास्थ्य बीमा: काम के दौरान होने वाली बीमारियों या दुर्घटनाओं के लिए पूर्ण स्वास्थ्य कवर दिया जाए।
- पदोन्नति (Promotion): वरिष्ठता के आधार पर कार्यकर्ताओं को पर्यवेक्षक (Supervisor) के पदों पर पदोन्नत करने की एक पारदर्शी प्रक्रिया बनाई जाए।
- कार्य के घंटे: ड्यूटी का समय निर्धारित हो और अतिरिक्त काम के लिए अलग से भुगतान किया जाए।
सरकार की संभावित चुनौतियाँ
राज्य सरकार के लिए यह मामला गले की हड्डी बन सकता है। यदि कोर्ट आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। प्रदेश में लगभग 1.90 लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं हैं। इन सभी को नियमित वेतनमान देने का अर्थ है प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का अतिरिक्त प्रावधान करना। हालांकि, चुनाव के समय सरकार ने मानदेय में कुछ वृद्धि की थी, लेकिन कार्यकर्ता अब पूर्णकालिक कर्मचारी के दर्जे से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
निष्कर्ष
जबलपुर हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप प्रदेश की लाखों महिलाओं के लिए आशा की किरण लेकर आया है। सालों से सड़कों पर आंदोलन करने वाली ये कार्यकर्ता अब कानूनी रास्ते से अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं। कोर्ट के अगले रुख पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं। यदि सरकार का जवाब संतोषजनक नहीं रहा, तो कोर्ट इस मामले में कोई बड़ा अंतरिम आदेश भी जारी कर सकता है। यह फैसला न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।





