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हाई कोर्ट का सख्त रुख: “रसूखदारों को बचाने के लिए पुलिस न बने ढाल, तुरंत जोड़ें नेताओं के नाम”

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकल पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने पाया कि मामले में ठोस सबूत और गवाहों के बयानों में स्पष्ट उल्लेख होने के बावजूद, पुलिस ने स्थानीय प्रभावशाली नेताओं के नाम एफआईआर (FIR) से बाहर रखे हैं। माननीय न्यायाधीश ने सख्त लहजे में निर्देश दिए हैं कि जांच अधिकारी कानून का पालन करें और बिना किसी दबाव के उन सभी व्यक्तियों को आरोपी बनाएं जिनके खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद की जड़

यह पूरा मामला एक जमीन विवाद और उसके बाद हुई हिंसा से जुड़ा है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि कुछ स्थानीय रसूखदार नेताओं के शह पर उनके साथ मारपीट की गई और उनकी संपत्ति पर कब्जा करने का प्रयास हुआ। जब पीड़ित ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, तो पुलिस ने केवल उन लोगों के नाम दर्ज किए जो मौके पर मौजूद (शूटर/गुंडे) थे, लेकिन उन ‘मास्टरमाइंड’ नेताओं के नाम हटा दिए जिनके निर्देश पर यह पूरी घटना अंजाम दी गई थी।

हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदु

  • पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल: जस्टिस ने सुनवाई के दौरान नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि पुलिस डायरी में गवाहों के बयानों में बार-बार कतिपय नेताओं के नाम आ रहे हैं, फिर भी उन्हें आरोपी की सूची में क्यों नहीं डाला गया? क्या पुलिस किसी दबाव में काम कर रही है?
  • नामजदगी में ‘पिक एंड चूज’ की नीति: कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस ‘पिक एंड चूज’ (पसंद और चयन) की नीति अपना रही है। आम आदमी के खिलाफ तुरंत केस दर्ज होता है, लेकिन जब बात सफेदपोश लोगों की आती है, तो जांच की गति धीमी हो जाती है या नाम गायब कर दिए जाते हैं।
  • धारा 319 CrPC/BNS के तहत निर्देश: कोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी और जांच अधिकारी को निर्देश दिए हैं कि वे पूरक चालान या अतिरिक्त रिपोर्ट के माध्यम से उन रसूखदारों के नाम जोड़ें जिनका अपराध में सीधा संबंध दिख रहा है।
  • निष्पक्ष जांच की समय सीमा: हाई कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए एक समय सीमा (Time Limit) तय की है। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि अगली सुनवाई से पहले इन नामों को जोड़ने की प्रक्रिया और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की स्टेटस रिपोर्ट (Status Report) कोर्ट में पेश की जाए।
  • अधिकारियों को चेतावनी: न्यायाधीश ने चेतावनी दी है कि यदि पुलिस ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं सुधारी, तो संबंधित जिले के एसपी (SP) को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब किया जा सकता है।

न्यायपालिका का कड़ा संदेश

हाई कोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया है कि रसूख और सत्ता के दम पर कानून की आंखों में धूल नहीं झोंकी जा सकती। जबलपुर हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उन सभी मामलों के लिए नजीर बनेगी जहाँ पुलिस राजनीतिक दबाव के कारण रसूखदारों पर हाथ डालने से कतराती है।

समाज पर प्रभाव

इस फैसले के बाद जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में खलबली मच गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्देश से पीड़ितों का न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होगा। अक्सर देखा जाता है कि छोटे अपराधियों को पकड़कर केस बंद कर दिया जाता है, लेकिन असली साजिशकर्ता बच निकलते हैं। हाई कोर्ट का यह रुख इस प्रथा को तोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है।

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