आज की बड़ी खबरें

जबलपुर में मकर संक्रांति पर उमड़ा आस्था का सैलाब, भव्य ‘खिचड़ी उत्सव’ में हजारों ने ग्रहण किया प्रसाद

संस्कारधानी में उत्सव का उल्लास

मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले जबलपुर (संस्कारधानी) में आज मकर संक्रांति का पर्व अभूतपूर्व उत्साह और भक्ति के साथ मनाया गया। सूर्य के उत्तरायण होने के इस पावन अवसर पर शहर के कोने-कोने में ‘खिचड़ी उत्सव’ की धूम रही। वैसे तो मकर संक्रांति पर दान-पुण्य की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन इस वर्ष जबलपुर के विभिन्न सामाजिक संगठनों, मंदिर समितियों और नगर निगम के साझा प्रयासों ने इसे एक भव्य सामुदायिक उत्सव का रूप दे दिया। शहर के प्रमुख चौराहों से लेकर नर्मदा के पावन तटों तक, हर जगह खिचड़ी के बड़े-बड़े कड़ाहे चढ़े नजर आए और हवा में देसी घी व मसालों की सोंधी महक घुली रही।

नर्मदा तटों पर महा-भोज का आयोजन

उत्सव का मुख्य केंद्र नर्मदा नदी के पावन तट—ग्वारीघाट, तिलवाराघाट और भेड़ाघाट रहे। सुबह की कड़कड़ाती ठंड के बावजूद लाखों श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में आस्था की डुबकी लगाई। स्नान के पश्चात, ‘नर्मदा तट संरक्षण समिति’ और स्थानीय स्वयंसेवकों द्वारा विशाल खिचड़ी वितरण शिविर लगाए गए। मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन करने से शनि और सूर्य दोनों की कृपा प्राप्त होती है। ग्वारीघाट पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम में लगभग 25,000 से अधिक लोगों ने पंगत में बैठकर खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण किया। यहाँ खिचड़ी को पूरी तरह सात्विक तरीके से, शुद्ध घी और मौसमी सब्जियों (मटर, गोभी, गाजर) के साथ तैयार किया गया था, जिसे श्रद्धालुओं ने ‘नर्मदा मैया की प्रसादी’ के रूप में बड़े चाव से स्वीकार किया।

शहर के प्रमुख चौराहों पर सामुदायिक एकता

नदी के तटों के अलावा, जबलपुर के शहरी क्षेत्रों जैसे मालवीय चौक, दमोह नाका, गोरखपुर और अधारताल में भी खिचड़ी उत्सव का भव्य आयोजन देखा गया। स्थानीय व्यापारी संघों और युवा मंडलों ने मिलकर सड़कों के किनारे पंडाल लगाए थे। इन आयोजनों की सबसे खास बात यह रही कि यहाँ अमीर-गरीब, जाति-पाति का भेद मिटाकर सभी वर्ग के लोग एक ही कतार में खड़े नजर आए। कई जगहों पर खिचड़ी के साथ दही, पापड़ और तिल-गुड़ के लड्डू भी परोसे गए। दमोह नाका पर आयोजित उत्सव में तो राहगीरों और ऑटो चालकों के लिए ‘ड्राइव-थ्रू’ वितरण की व्यवस्था की गई थी, ताकि किसी का समय भी बर्बाद न हो और सबको प्रसाद मिल सके।

सेवा और मानवता का संगम

इस वर्ष के खिचड़ी उत्सव में सेवा का भाव भी प्रबल दिखा। शहर के कुछ एनजीओ (NGOs) ने मिलकर ‘कोई भूखा न रहे’ अभियान के तहत झुग्गी-झोपड़ियों और रैन बसेरों में जाकर गरम खिचड़ी बांटी। अस्पतालों के बाहर मरीजों के परिजनों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा, नगर निगम ने स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा; खिचड़ी वितरण के लिए केवल मिट्टी के पात्रों (दौना-पत्तल) का उपयोग किया गया और स्वयंसेवकों की टीम तुरंत सफाई सुनिश्चित कर रही थी।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

जबलपुर के विद्वानों और ज्योतिषियों के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी का महत्व केवल भोजन तक सीमित नहीं है। खिचड़ी में उपयोग होने वाले चावल को चंद्रमा का, दाल को शनि का, हल्दी को बृहस्पति का और घी को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। जबलपुर के मानस भवन में आयोजित एक गोष्ठी में बताया गया कि यह उत्सव सामाजिक समरसता का प्रतीक है, जहाँ समाज का हर अंग एक साथ मिलकर खुशियां बांटता है। शाम ढलते-ढलते पूरे शहर में पतंगबाजी के साथ-साथ ‘तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला’ की गूंज रही, जिसने इस उत्सव की मिठास को और बढ़ा दिया।

जबलपुर का यह ‘खिचड़ी उत्सव’ न केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन था, बल्कि इसने शहर की एकता और सेवाभावी संस्कृति को एक बार फिर दुनिया के सामने मजबूती से रखा।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *