नर्मदाष्टक के स्वरों से गूँजी संस्कारधानी: नर्मदा जयंती पर ग्वारीघाट से भेड़ाघाट तक आस्था का सैलाब, महाआरती में उमड़े लाखों श्रद्धालु
जबलपुर की जीवनरेखा और आस्था का केंद्र माँ नर्मदा का प्राकट्योत्सव आज पूरे हर्षोल्लास और आध्यात्मिक गौरव के साथ मनाया गया। संस्कारधानी के तमाम नर्मदा तट—विशेषकर ग्वारीघाट, भेड़ाघाट, तिलवाराघाट और जिलहरीघाट—भक्तों के ‘नर्मदे हर’ के जयकारों से गुंजायमान रहे। आज सुबह की मंगला आरती से लेकर देर रात तक चलने वाले भंडारों तक, पूरा शहर नर्मदा भक्ति के रंग में सराबोर नजर आया।
लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं ने पुण्यसलिला नर्मदा में डुबकी लगाई और सुख-समृद्धि की कामना की। प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से आयोजित इस उत्सव ने जबलपुर की सांस्कृतिक गरिमा को एक बार फिर विश्व पटल पर स्थापित किया।
ग्वारीघाट: मिनी कुंभ जैसा नजारा
शहर के सबसे प्रमुख तट ग्वारीघाट पर आज तिल रखने की भी जगह नहीं थी। तड़के 4 बजे से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया था।
- अभिषेक और पूजन: दोपहर के समय माँ नर्मदा का विधि-विधान से दुग्धाभिषेक किया गया। विशाल चुनरी मनोरथ के तहत भक्तों ने माँ नर्मदा को कई किलोमीटर लंबी चुनरी अर्पित की, जो पानी की लहरों पर तैरती हुई अलौकिक दृश्य प्रस्तुत कर रही थी।
- महाआरती का वैभव: शाम होते ही ग्वारीघाट के तट हजारों दीपों की रोशनी से जगमगा उठे। वाराणसी की तर्ज पर होने वाली महाआरती आज विशेष थी। ग्यारह पंडितों ने जब शंखनाद और मंत्रोच्चार के साथ विशाल दीपदान किया, तो ऐसा लगा मानो स्वर्ग की गंगा नर्मदा के तट पर उतर आई हो।
भेड़ाघाट: धुआंधार की लहरों पर अध्यात्म
विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट में संगमरमरी चट्टानों के बीच नर्मदा जयंती का स्वरूप और भी भव्य रहा।
- सांस्कृतिक संध्या: यहाँ स्थानीय कलाकारों और भजन मंडलियों द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी गई। धुआंधार जलप्रपात की गर्जना के साथ नर्मदाष्टक के पाठ ने माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया।
- विदेशी पर्यटकों का उत्साह: नर्मदा जयंती के इस पावन पर्व को देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी पहुँचे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और नदी पूजा की परंपरा को अचंभित होकर निहारा।
शहर में भंडारे और रथयात्राओं की धूम
नर्मदा जयंती का उत्सव केवल घाटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर के हृदय स्थल तक इसकी गूँज सुनाई दी।
- विशाल रथयात्रा: शहर के मुख्य मार्गों से माँ नर्मदा की भव्य प्रतिमा के साथ रथयात्रा निकाली गई। झांकियों में नर्मदा के उद्गम (अमरकंटक) से लेकर सागर मिलन तक की कथा को जीवंत किया गया था।
- भंडारों की श्रृंखला: शहर के लगभग हर चौराहे पर नर्मदा भक्तों द्वारा विशाल भंडारों का आयोजन किया गया। पूड़ी-सब्जी और हलवे के प्रसाद के साथ राहगीरों की सेवा की गई।
- स्वच्छता का संकल्प: कई सामाजिक संगठनों ने ‘स्वच्छ नर्मदा-अविरल नर्मदा’ का संदेश देते हुए घाटों पर सफाई अभियान भी चलाया और लोगों को जल प्रदूषण न करने की शपथ दिलाई।
प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा
लाखों की भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह मुस्तैद रहा।
- ड्रोन से निगरानी: भीड़ नियंत्रण के लिए प्रमुख घाटों पर ड्रोन कैमरों से नजर रखी गई।
- होमगार्ड और गोताखोर: गहरे पानी में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए एसडीईआरएफ (SDERF) और स्थानीय गोताखोरों की टीमें नावों के साथ तैनात रहीं।
- यातायात प्रबंधन: ग्वारीघाट जाने वाले मार्गों पर वाहनों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था और अस्थायी पार्किंग की व्यवस्था की गई थी।
निष्कर्ष
नर्मदा जयंती का यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के बीच के अटूट संबंध का उत्सव है। जबलपुर की पहचान माँ नर्मदा से है, और आज के इस ‘प्राकट्योत्सव’ ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि नदियाँ हमारे अस्तित्व का आधार हैं। शाम को जब लाखों दीप नर्मदा की लहरों पर बह रहे थे, तो वे हर श्रद्धालु के मन में आस्था की नई जोत जला रहे थे।



