जबलपुर सहित पूरे मध्य प्रदेश के किसानों के लिए इन दिनों ‘गेहूं का मामा’ (वैज्ञानिक नाम: Phalaris minor) एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। यह खरपतवार न केवल गेहूं की फसल को बर्बाद कर रहा है, बल्कि अपनी ‘नकलची’ प्रकृति के कारण पहचान में भी नहीं आता। जबलपुर स्थित खरपतवार अनुसंधान निदेशालय (DWR) के वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
‘गेहूं का मामा’: एक बहरूपिया दुश्मन
क्यों कहते हैं इसे ‘नकलची’ खरपतवार?
इसे ‘गेहूं का मामा’, ‘गुल्ली-डंडा’ या ‘कनकी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत और समस्या यह है कि शुरुआती 40-50 दिनों तक यह बिल्कुल गेहूं के पौधे जैसा दिखता है। इसकी पत्तियों का रंग, बनावट और बढ़ने का तरीका हूबहू गेहूं जैसा होता है। किसान चाहकर भी इसे फसल से अलग नहीं पहचान पाते, और जब इसमें बालियां निकलती हैं, तब तक यह फसल को 40% तक नुकसान पहुंचा चुका होता है।
जबलपुर और प्रदेश में बढ़ता प्रकोप
हालिया रिपोर्टों (जनवरी 2026) के अनुसार, पंजाब और हरियाणा के बाद अब यह मध्य प्रदेश के मालवा और महाकौशल क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है। जबलपुर जिले के लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बीज की गुणवत्ता में कमी और सिंचाई के पुराने तरीकों के कारण इसके बीज एक खेत से दूसरे खेत में पहुंच रहे हैं।
फसल पर घातक प्रभाव
‘गेहूं का मामा’ केवल जगह ही नहीं घेरता, बल्कि यह गेहूं के पौधे का ‘हक’ भी छीन लेता है:
- पोषक तत्वों की चोरी: यह जमीन से खाद, पानी और धूप को गेहूं के पौधे की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सोखता है।
- विकास में बाधा: यह गेहूं के पौधों की जड़ों को जकड़ लेता है, जिससे फसल की ग्रोथ रुक जाती है।
- उत्पादन में गिरावट: एक अनुमान के अनुसार, यदि एक वर्ग मीटर में इसके 15-20 पौधे हों, तो गेहूं की पैदावार में 15% से 40% तक की कमी आ सकती है।
रासायनिक प्रतिरोध (Herbicide Resistance) की समस्या
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस खरपतवार ने ‘आइसोप्रोटयूरान’ जैसी आम खरपतवार नाशक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। यानी अब साधारण दवाएं इस पर बेअसर साबित हो रही हैं। जबलपुर के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, किसान अब अधिक शक्तिशाली और नई दवाओं का उपयोग करने को मजबूर हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है।
बचाव और नियंत्रण के उपाय
कृषि विभाग और ICAR-DWR जबलपुर ने किसानों के लिए निम्नलिखित सलाह जारी की है:
- बीज शोधन: हमेशा प्रमाणित और साफ बीजों का ही उपयोग करें।
- फसल चक्र (Crop Rotation): लगातार गेहूं बोने के बजाय बीच में सरसों या चने की फसल लें, जिससे इस खरपतवार का जीवन चक्र टूट सके।
- सही समय पर छिड़काव: बुवाई के 30-35 दिनों के भीतर (जब खरपतवार 2-3 पत्ती की अवस्था में हो) ही नींदानाशक दवाओं का छिड़काव करें।
- निराई-गुड़ाई: यदि संभव हो, तो बालियां आने से पहले हाथ से इन्हें उखाड़कर नष्ट कर दें ताकि इनके बीज खेत में न गिरें।
निष्कर्ष
‘गेहूं का मामा’ केवल एक घास नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक कमर तोड़ने वाला एक गंभीर संकट है। जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान केंद्र में इस पर निरंतर शोध जारी है ताकि ऐसी तकनीक विकसित की जा सके जिससे इस बहरूपिया खरपतवार को शुरुआत में ही नष्ट किया जा सके। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे केवल विज्ञापनों के भरोसे दवा न खरीदें, बल्कि कृषि विशेषज्ञों की राय के बाद ही छिड़काव करें।





