मकर संक्रांति पर 1100 साल पुरानी परंपरा: नर्मदा के ग्वारीघाट पर आस्था का सैलाब और ऐतिहासिक मेला
संस्कारधानी जबलपुर में मकर संक्रांति का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत का जीवंत उत्सव बन गया है। इस वर्ष भी, नर्मदा नदी के पावन तटों, विशेषकर ग्वारीघाट और तिलवाराघाट पर भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा है।
यहाँ आयोजित होने वाले ऐतिहासिक मेले का इतिहास 1100 साल पुराना बताया जाता है, जो जबलपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों की गहराई को दर्शाता है। 17 जनवरी 2026 को भी मेले में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है, जहाँ लोग नर्मदा के शीतल जल में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित कर रहे हैं।
1100 साल का इतिहास और परंपरा
जबलपुर के वरिष्ठ जानकारों और पुजारियों के अनुसार, नर्मदा तट पर इस मेले की शुरुआत कल्चुरी काल के दौरान हुई थी। यह मेला पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी उसी मौलिकता को संजोए हुए है। प्राचीन काल में, यह मेला मध्य भारत के व्यापारियों और साधु-संतों के मिलन का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज भी, यहाँ दूर-दराज के गांवों से लोग बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों में बैठकर पोंगल और संक्रांति मनाने आते हैं, जो भारत की ‘अनेकता में एकता’ का परिचय देता है।
ग्वारीघाट पर ‘महा-आरती’ का दिव्य दृश्य
मेले का सबसे मुख्य आकर्षण ग्वारीघाट पर होने वाली विशेष नर्मदा आरती है। मकर संक्रांति के अवसर पर शाम को होने वाली इस आरती को भव्य रूप दिया गया है।
- दीपदान: हजारों श्रद्धालुओं ने नर्मदा मैया की गोद में मिट्टी के दीपक प्रवाहित किए, जिससे पूरी नदी स्वर्णमयी आभा से चमक उठी।
- भजन संध्या: आरती के बाद प्रसिद्ध गायकों द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी गई, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
- तिल-गुड़ का भोग: मान्यता के अनुसार, इस दिन नर्मदा जी को तिल और गुड़ का विशेष भोग लगाया गया और बाद में इसे भक्तों के बीच वितरित किया गया।
मेले के आकर्षण: ग्रामीण संस्कृति की झलक
नर्मदा तट के किनारे किलोमीटरों तक फैले इस मेले में आधुनिकता और ग्रामीण संस्कृति का अनूठा मेल देखने को मिलता है:
- पारंपरिक हस्तशिल्प: मेले में मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के खिलौने और हाथ से बनी वस्तुओं की सैकड़ों दुकानें सजी हैं।
- पकवानों का स्वाद: जबलपुर की प्रसिद्ध ‘मंगोड़ी’, गुड़ वाली जलेबी और संक्रांति की विशेष ‘खिचड़ी’ के स्टालों पर भारी भीड़ देखी जा रही है।
- मनोरंजन: बच्चों के लिए बड़े झूले, जादू के शो और पारंपरिक लोक नृत्यों का आयोजन किया जा रहा है, जो मेले की रौनक बढ़ा रहे हैं।
सुरक्षा और प्रशासन के इंतजाम
लाखों की भीड़ को देखते हुए जबलपुर जिला प्रशासन और पुलिस ने व्यापक प्रबंध किए हैं:
- ड्रोन सर्विलांस: घाटों की निगरानी के लिए ड्रोन कैमरों का उपयोग किया जा रहा है।
- गोताखोरों की तैनाती: स्नान के दौरान किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए एनडीआरएफ (NDRF) और स्थानीय गोताखोरों की टीमें 24 घंटे तैनात हैं।
- ट्रैफिक डायवर्जन: ग्वारीघाट जाने वाले मार्गों पर वाहनों के प्रवेश को सीमित कर दिया गया है ताकि पैदल यात्रियों को असुविधा न हो।
धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
मकर संक्रांति पर नर्मदा स्नान का विशेष महत्व है। माना जाता है कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तो इस समय किया गया दान और स्नान अक्षय फल प्रदान करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी, कड़ाके की ठंड के बाद नर्मदा का जल शरीर में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।
निष्कर्ष
जबलपुर का यह 1100 साल पुराना मेला इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी आधुनिकता के बीच अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। नर्मदा के तट पर गूँजते ‘हर-हर नर्मदे’ के उद्घोष और लाखों लोगों की यह श्रद्धा बताती है कि हमारी आस्था आज भी उतनी ही अटल है जितनी सदियों पहले थी। यह मेला न केवल जबलपुर की पहचान है, बल्कि यह मध्य प्रदेश की गौरवशाली विरासत का एक अटूट हिस्सा है।





