हनुमान चालीसा का अनूठा चित्रण: जबलपुर के कलाकार ने ‘बौद्ध कला’ के रंगों में पिरोई हनुमान भक्ति
कला और संस्कृति की धानी कही जाने वाली संस्कारधानी जबलपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने कला जगत और आध्यात्मिक दुनिया दोनों को अचंभित कर दिया है।
जबलपुर के एक प्रतिभाशाली युवा कलाकार ने हनुमान चालीसा की चौपाइयों को श्रीलंका की अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ ‘डेगलडोरुवा’ (Degaldoruwa) शैली में चित्रित किया है। यह अनूठा प्रयोग न केवल दो देशों की संस्कृतियों को जोड़ता है, बल्कि यह पहली बार है जब भगवान हनुमान की शौर्य गाथा को विशुद्ध बौद्ध चित्रकला शैली में ढाला गया है।
क्या है ‘डेगलडोरुवा’ शैली?
‘डेगलडोरुवा’ श्रीलंका की एक पारंपरिक चित्रकला शैली है, जिसका उदय 18वीं शताब्दी के दौरान कैंडी (Kandy) युग में हुआ था। यह शैली मुख्य रूप से श्रीलंका के प्रसिद्ध ‘डेगलडोरुवा राजा महा विहार’ (गुफा मंदिर) की दीवारों पर देखने को मिलती है।
- विशेषताएं: इस शैली में गहरे लाल (Maroon), केसरिया और मिट्टी के रंगों का उपयोग किया जाता है।
- कलात्मकता: इसमें आकृतियों को बहुत ही सरल लेकिन प्रभावशाली रेखाओं से उकेरा जाता है। फूलों, लताओं और पारंपरिक श्रीलंकाई आभूषणों का सूक्ष्म अंकन इस कला की पहचान है।
हनुमान चालीसा और श्रीलंका का गहरा संबंध
जबलपुर के इस कलाकार का विचार था कि चूंकि हनुमान जी का रामायण में सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लंका (वर्तमान श्रीलंका) से जुड़ा है, इसलिए क्यों न उनकी स्तुति को उसी भूमि की प्राचीन कला शैली में प्रस्तुत किया जाए।
चित्रण की मुख्य विशेषताएं:
- चौपाइयों का विजुअलाइजेशन: हनुमान चालीसा की प्रत्येक महत्वपूर्ण चौपाई, जैसे “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर” से लेकर “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” तक को अलग-अलग पैनलों में चित्रित किया गया है।
- हाइब्रिड संस्कृति: चित्रों में हनुमान जी का स्वरूप भारतीय है, लेकिन उनकी वेशभूषा, मुकुट और पृष्ठभूमि में उपयोग किए गए रूपांकन (Motifs) पूरी तरह से श्रीलंकाई ‘कैंडियन’ कला से प्रेरित हैं।
- प्राकृतिक रंग: कलाकार ने इस चित्रण के लिए रसायनों के बजाय जड़ी-बूटियों और पत्थरों से तैयार प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया है, ताकि ‘डेगलडोरुवा’ की मौलिकता बनी रहे।
क्यों हो रही है प्रदेश भर में चर्चा?
यह कलाकृति सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे मध्य प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं:
- सांस्कृतिक सेतु: यह चित्रण भारत और श्रीलंका के साझा रामायण इतिहास को कला के माध्यम से पुनर्जीवित करता है।
- अद्भुत प्रयोग: आमतौर पर हनुमान जी के चित्र ‘कैलेंडर आर्ट’ या ‘तंजौर शैली’ में देखे जाते हैं, लेकिन बौद्ध विहारों की कला में उनका ऐसा सौम्य और विस्तृत रूप पहले कभी नहीं देखा गया।
- शोध का विषय: कला समीक्षकों का मानना है कि यह प्रयोग दर्शाता है कि कैसे भक्ति और कला की कोई सीमा नहीं होती।
कलाकार का उद्देश्य
जबलपुर के इस युवा चित्रकार का कहना है कि वे युवा पीढ़ी को भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और पड़ोसी देशों की प्राचीन कलाओं से परिचित कराना चाहते थे। उनके अनुसार, “हनुमान जी ने लंका में शांति और शक्ति दोनों का परिचय दिया था, यह कलाकृति उसी संतुलन को दर्शाने का एक प्रयास है।”
निष्कर्ष
जबलपुर का यह ‘हनुमान चालीसा चित्रण’ कला के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर है। यह हमें याद दिलाता है कि कला केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि संवाद का एक माध्यम है। श्रीलंका की ‘डेगलडोरुवा’ शैली और भारतीय ‘हनुमान चालीसा’ का यह मिलन न केवल आंखों को सुकून देता है, बल्कि हमारी साझा एशियाई विरासत पर गर्व करने का अवसर भी प्रदान करता है।



